अजित पवार के जाने के बाद किसका होगा राज्याभिषेक?
महाराष्ट्र की राजनीति इस वक्त एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहाँ हर घंटे तस्वीर बदलती नजर आ रही है। उपमुख्यमंत्री अजित पवार के अचानक दुखद निधन के बाद राज्य की सत्ता में जो खालीपन पैदा हुआ, उसने न सिर्फ एनसीपी बल्कि पूरे सियासी गलियारों में हलचल मचा दी है। इसी उथल-पुथल के बीच अब एक नाम तेजी से उभरकर सामने आ रहा है—सुनेत्रा पवार।
बीते कुछ दिनों से राजनीतिक चर्चाओं में जिस चेहरे की सबसे ज्यादा चर्चा हो रही है, वह कोई और नहीं बल्कि पवार परिवार की बहू और बारामती की सियासत से गहराई से जुड़ी सुनेत्रा पवार हैं। सवाल अब यह नहीं रह गया कि क्या उन्हें कोई बड़ी जिम्मेदारी मिलेगी, बल्कि यह है कि कब।
देर रात की मुलाकात, जिसने सबका ध्यान खींचा
बुधवार देर रात पुणे में एक ऐसी मुलाकात हुई, जिसने सियासी हलकों में हलचल तेज कर दी। एनसीपी के कद्दावर नेता प्रफुल्ल पटेल और महाराष्ट्र सरकार में मंत्री छगन भुजबल अचानक सुनेत्रा पवार के आवास पहुंचे। यह कोई औपचारिक मुलाकात नहीं थी, बल्कि इसे बेहद गोपनीय तरीके से अंजाम दिया गया।
राजनीतिक जानकारों के मुताबिक, इस बैठक का समय, स्थान और इसमें शामिल चेहरे—तीनों अपने आप में बड़ा संकेत हैं। सवाल उठने लगे हैं कि क्या यह मुलाकात सिर्फ शोक संवेदना तक सीमित थी, या इसके पीछे सत्ता के समीकरणों की नई स्क्रिप्ट लिखी जा रही थी?
एनसीपी के अंदरूनी सूत्रों का कहना है कि पार्टी नेतृत्व इस वक्त जल्दबाजी नहीं दिखाना चाहता, लेकिन हालात ऐसे हैं कि फैसले टालना भी आसान नहीं है।
क्यों सुनेत्रा पवार का नाम सबसे आगे?
अजित पवार के जाने के बाद पार्टी के सामने सबसे बड़ी चुनौती है—नेतृत्व और स्थिरता। ऐसे समय में सुनेत्रा पवार का नाम सामने आना कई वजहों से अहम माना जा रहा है।
सबसे पहले, वे पवार परिवार की सदस्य हैं और बारामती की राजनीति को बेहद करीब से समझती हैं। दूसरा, अब तक वे सक्रिय राजनीति से भले ही दूरी बनाए रही हों, लेकिन पर्दे के पीछे संगठन और सामाजिक कामों में उनकी भूमिका से कोई अनजान नहीं है।
एनसीपी के कई नेताओं का मानना है कि मौजूदा हालात में पार्टी को ऐसे चेहरे की जरूरत है, जो न सिर्फ भावनात्मक रूप से कार्यकर्ताओं को जोड़े, बल्कि सत्ता के संतुलन को भी साध सके।
पार्टी के भीतर से उठने लगी खुली आवाज़ें
अब तक जो चर्चाएं बंद कमरों तक सीमित थीं, वे धीरे-धीरे सार्वजनिक मंचों पर आने लगी हैं। विधानसभा उपाध्यक्ष नरहरि जिरवाल का बयान इस पूरे घटनाक्रम में बेहद अहम माना जा रहा है।
उन्होंने खुलकर कहा,
“पार्टी की बागडोर संभालने के लिए ‘वहिनी’ यानी सुनेत्रा पवार से बेहतर विकल्प कोई नहीं हो सकता।”
यह बयान सिर्फ एक राय नहीं, बल्कि पार्टी के भीतर बनते माहौल की झलक माना जा रहा है। जब वरिष्ठ नेता सार्वजनिक रूप से किसी नाम का समर्थन करने लगें, तो समझा जाता है कि जमीन पहले ही तैयार हो चुकी है।
प्रफुल्ल पटेल और भुजबल का साथ—संयोग या संकेत?
राजनीति में संयोग बहुत कम और संकेत बहुत ज्यादा होते हैं। प्रफुल्ल पटेल और छगन भुजबल जैसे अनुभवी नेताओं का एक साथ सुनेत्रा पवार से मिलना, साधारण घटना नहीं मानी जा रही।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि यह मुलाकात पार्टी में एकजुटता का संदेश देने के लिए भी हो सकती है। अजित पवार के बाद एनसीपी में किसी भी तरह का टूट-फूट का संदेश जाना पार्टी के लिए नुकसानदेह हो सकता है।
ऐसे में पवार परिवार से जुड़ा चेहरा सामने लाकर पार्टी यह दिखाना चाहती है कि नेतृत्व सुरक्षित हाथों में है।
बजट सत्र और शपथ की अटकलें
महाराष्ट्र विधानसभा का बजट सत्र चल रहा है और ऐसे समय में सत्ता में बदलाव हमेशा खास मायने रखता है। सियासी गलियारों में यह चर्चा तेज है कि अगर फैसला जल्दी होता है, तो बजट से पहले ही सुनेत्रा पवार को शपथ दिलाई जा सकती है।
अगर ऐसा होता है, तो यह सिर्फ एक पद की भरपाई नहीं होगी, बल्कि राज्य की राजनीति में एक नया अध्याय जुड़ जाएगा। सुनेत्रा पवार महाराष्ट्र की उन चुनिंदा महिला नेताओं में शुमार हो जाएंगी, जिनका प्रभाव सत्ता के केंद्र तक होगा।
विपक्ष की पैनी नजर
जहाँ एक ओर महायुति सरकार के भीतर बैठकों और रणनीतियों का दौर चल रहा है, वहीं विपक्ष भी पूरी स्थिति पर नजर बनाए हुए है। शरद पवार गुट इस पूरे घटनाक्रम को बेहद ध्यान से देख रहा है।
राजनीतिक जानकार मानते हैं कि अगर सुनेत्रा पवार को आगे लाया जाता है, तो ‘पवार बनाम पवार’ की राजनीति एक बार फिर तेज हो सकती है, खासकर बारामती में।
विपक्ष इसे वंशवाद का मुद्दा बना सकता है, जबकि एनसीपी इसे मजबूरी और संगठनात्मक स्थिरता का फैसला बता सकती है।
जनता के मन में सवाल
आम लोगों के बीच भी इस खबर को लेकर उत्सुकता है। सोशल मीडिया पर सुनेत्रा पवार का नाम ट्रेंड करने लगा है। कोई इसे भावनात्मक फैसला बता रहा है, तो कोई इसे सियासी रणनीति।
लोग जानना चाहते हैं—
- क्या सुनेत्रा पवार सक्रिय राजनीति में उतरेंगी?
- क्या वे अजित पवार की विरासत संभाल पाएंगी?
- और सबसे बड़ा सवाल—क्या यह फैसला पार्टी को मजबूत करेगा या नई बहसों को जन्म देगा?
आगे क्या?
फिलहाल तस्वीर पूरी तरह साफ नहीं है, लेकिन संकेत साफ हैं। आने वाले कुछ दिनों में महाराष्ट्र की राजनीति कोई बड़ा मोड़ ले सकती है। देर रात की बैठकों से लेकर नेताओं के बयानों तक—हर कड़ी इस ओर इशारा कर रही है कि फैसला ज्यादा दूर नहीं।
एक बात तय है—अजित पवार के बाद जो खालीपन पैदा हुआ है, उसे भरना सिर्फ एक पद का मामला नहीं, बल्कि पूरे सियासी संतुलन का सवाल है। और इस संतुलन की धुरी बन सकती हैं—सुनेत्रा पवार।
