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ट्रंप का दावा और भारत की चुप्पी! क्या पर्दे के पीछे पुतिन का साथ छोड़ चुका है भारत?

फरवरी 2026 का दूसरा हफ्ता भारत की विदेश नीति के लिए शायद सबसे संवेदनशील मोड़ लेकर आया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच हुई हालिया फोन कॉल, उसके बाद घोषित भारत अमेरिका व्यापार समझौता, और फिर 18 प्रतिशत टैरिफ वाली ट्रंप मोदी ट्रेड डील — इन सबके बीच एक सवाल पूरी दुनिया में गूंज रहा है।

क्या भारत अब रूस से दूरी बनाने जा रहा है?
क्या रूस भारत तेल डील का दौर खत्म होने वाला है?
और सबसे अहम — क्या सस्ता तेल पाने वाला भारत अब अमेरिका के दबाव में अपनी दशकों पुरानी रणनीति बदल देगा?

ट्रंप का बड़ा दावा और रूस को झटका

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सोशल मीडिया पर जो दावा किया, उसने मॉस्को से लेकर नई दिल्ली तक हलचल बढ़ा दी। ट्रंप ने कहा कि भारत रूसी कच्चे तेल की खरीद बंद करने पर सहमत हो गया है और इसके बदले अमेरिका से तेल और गैस खरीदेगा।

अगर यह दावा पूरी तरह सच साबित होता है, तो यह सीधे तौर पर रूस को झटका माना जाएगा।
यूक्रेन युद्ध के बाद भारत रूस का सबसे बड़ा तेल खरीदार बनकर उभरा था। रियायती दरों पर मिलने वाला सस्ता तेल और भारत — यह समीकरण भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए संजीवनी साबित हुआ था।

भारत की मजबूरी या रणनीतिक चाल?

लेकिन सवाल यह है कि क्या भारत इतनी आसानी से रूस से किनारा कर सकता है?

विशेषज्ञ मानते हैं कि भारत की स्थिति मजबूरी से ज्यादा रणनीतिक है। एक तरफ अमेरिका जैसा बड़ा बाजार है, जहां भारत अमेरिका व्यापार समझौता के तहत भारतीय उत्पादों पर केवल 18% टैरिफ लगेगा। दूसरी तरफ रूस है, जो दशकों से भारत का भरोसेमंद साझेदार रहा है।

भारत को यहां भावनाओं से नहीं, बल्कि संतुलन से फैसला लेना होगा — और यही भारत की विदेश नीति की पहचान रही है।

रूस–भारत रिश्तों की गहराई

रूस और भारत का रिश्ता सिर्फ तेल तक सीमित नहीं है।

  • रक्षा सौदों में रूस सबसे बड़ा सप्लायर
  • परमाणु ऊर्जा में सहयोग
  • संयुक्त सैन्य अभ्यास
  • अंतरराष्ट्रीय मंचों पर एक-दूसरे का समर्थन

ऐसे में रूस भारत तेल डील को पूरी तरह खत्म करना सिर्फ एक आर्थिक फैसला नहीं, बल्कि एक रणनीतिक झटका होगा।

पूर्व राजनयिकों का मानना है कि भारत कभी भी “ऑल-ऑर-नथिंग” वाली नीति नहीं अपनाता।

सरकार की चुप्पी क्या संकेत दे रही है?

दिलचस्प बात यह है कि ट्रंप के दावे के बाद भी भारत सरकार की तरफ से कोई स्पष्ट बयान नहीं आया है। न विदेश मंत्रालय ने पुष्टि की है, न ही खंडन।

सरकारी सूत्रों का कहना है कि भारत अपनी रणनीतिक स्वायत्तता से समझौता नहीं करेगा।
संकेत साफ हैं — भारत रूस से तेल पूरी तरह बंद नहीं करेगा, लेकिन विकल्प जरूर बढ़ाएगा।

यानी:

  • रूस से तेल कम मात्रा में
  • अमेरिका और खाड़ी देशों से आयात बढ़ेगा
  • सप्लाई सोर्स का Diversification

ट्रंप मोदी ट्रेड डील: भारत को क्या मिल रहा है?

अगर इस पूरे घटनाक्रम को भारत के नजरिए से देखें, तो फायदे भी कम नहीं हैं।

  • अमेरिकी बाजार में आसान एंट्री
  • भारतीय निर्यातकों को राहत
  • टेक्सटाइल, आईटी और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को बूस्ट
  • लाखों रोजगार की संभावना

ट्रंप मोदी ट्रेड डील भारत को वैश्विक सप्लाई चेन में मजबूत जगह दिला सकती है।

रूस की चिंता क्यों बढ़ी?

मॉस्को के लिए भारत सिर्फ ग्राहक नहीं, बल्कि भरोसेमंद साझेदार है।
अगर भारत तेल खरीद कम करता है, तो रूस को नए खरीदार तलाशने होंगे — वो भी ऐसे समय में जब उस पर पहले से ही पश्चिमी प्रतिबंध लगे हैं।

यही वजह है कि ट्रंप के बयान को रूस में गंभीरता से लिया जा रहा है।
राजनीतिक विश्लेषक इसे सीधे तौर पर रूस को झटका बता रहे हैं।

क्या भारत अमेरिका के दबाव में है?

यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या अमेरिका भारत पर दबाव बना रहा है?

विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका भारत को मजबूर नहीं कर सकता, लेकिन आकर्षक ऑफर जरूर दे सकता है — और 18% टैरिफ उसी रणनीति का हिस्सा है।

भारत यहां “या तो यह या वह” की जगह “दोनों” वाला रास्ता चुन सकता है।

भारत की विदेश नीति: न झुकाव, न टकराव

आज का भारत वही नीति अपनाता है जिसे कूटनीतिक भाषा में Multi-Alignment कहा जाता है।

  • अमेरिका से व्यापार
  • रूस से रणनीतिक साझेदारी
  • यूरोप से तकनीकी सहयोग
  • एशिया में संतुलन

यही वजह है कि भारत की विदेश नीति को दुनिया में अलग नजर से देखा जाता है।

आगे क्या होगा?

अगले कुछ महीनों में कई संकेत साफ होंगे:

  • रूस के साथ तेल आयात के नए आंकड़े
  • अमेरिका से ऊर्जा समझौतों का विस्तार
  • आधिकारिक दस्तावेज़ों में भाषा का बदलाव

फिलहाल इतना तय है कि भारत कोई जल्दबाजी में फैसला नहीं करेगा।

निष्कर्ष

रूस भारत तेल डील, भारत अमेरिका व्यापार समझौता, और ट्रंप मोदी ट्रेड डील — ये तीनों मुद्दे एक-दूसरे से जुड़े जरूर हैं, लेकिन भारत के लिए फैसला एकतरफा नहीं है।

भारत सस्ता तेल भी चाहता है, मजबूत व्यापार भी, और अपनी रणनीतिक आज़ादी भी।
यही संतुलन भारत की असली ताकत है।

दुनिया की नजरें अब इस पर टिकी हैं कि भारत कैसे रूस और अमेरिका के बीच यह कूटनीतिक रस्साकशी संभालता है — क्योंकि जो भी फैसला होगा, उसका असर सिर्फ भारत पर नहीं, बल्कि पूरी वैश्विक राजनीति पर पड़ेगा।