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जानें कौन हैं तारिक रहमान, जो 17 साल के ‘ वनवास ‘ के बाद सीधे बनेंगे प्रधानमंत्री!

बांग्लादेश की राजनीति ने एक ऐसा मोड़ लिया है, जिसकी आहट पिछले कुछ महीनों से सुनाई दे रही थी, लेकिन नतीजा इतना बड़ा होगा—यह शायद कम ही लोगों ने सोचा था। ऐतिहासिक आम चुनावों में बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) ने प्रचंड बहुमत के साथ सत्ता में वापसी की है। शेख हसीना सरकार के पतन के बाद हुए इन चुनावों ने न सिर्फ सत्ता बदली है, बल्कि देश की राजनीतिक दिशा भी बदल दी है।

लेकिन इस जीत से भी ज्यादा चर्चा उस नाम की है, जो पिछले 17 सालों से बांग्लादेश की जमीन से दूर था—तारिक रहमान। लंदन में लंबे निर्वासन के बाद अब वही शख्स देश की सत्ता के शीर्ष पर पहुंचने जा रहा है। ढाका की सड़कों पर उनके समर्थकों का उत्साह साफ बताता है कि यह सिर्फ राजनीतिक बदलाव नहीं, बल्कि भावनात्मक वापसी भी है।

कौन हैं तारिक रहमान?

तारिक रहमान बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री बेगम खालिदा जिया और पूर्व राष्ट्रपति जियाउर रहमान के बेटे हैं। राजनीतिक विरासत उन्हें विरासत में मिली, लेकिन रास्ता आसान नहीं था। 58 वर्षीय तारिक वर्तमान में BNP के कार्यवाहक अध्यक्ष रहे हैं और पिछले डेढ़ दशक से पार्टी की रणनीति विदेश से तय करते रहे।

2008 में देश छोड़ने के बाद वह लंदन में रहे। आधिकारिक तौर पर यह इलाज के लिए अस्थायी प्रवास बताया गया था, लेकिन धीरे-धीरे यह लंबा निर्वासन बन गया। इसके बावजूद उन्होंने डिजिटल प्लेटफॉर्म, वर्चुअल संबोधनों और सोशल मीडिया के जरिए अपने समर्थकों से संपर्क बनाए रखा।

BNP के कार्यकर्ताओं के बीच उन्हें अक्सर ‘क्राउन प्रिंस’ कहा जाता है—एक ऐसा नेता जो सत्ता से दूर रहते हुए भी पार्टी का चेहरा बना रहा।

17 साल का वनवास और आरोपों का साया

तारिक रहमान का राजनीतिक सफर विवादों से अछूता नहीं रहा। 2008 में जब बांग्लादेश में सेना समर्थित अंतरिम सरकार थी, तब उन पर भ्रष्टाचार और जबरन वसूली के कई आरोप लगे। कानूनी कार्रवाई तेज हुई और इसी बीच वह लंदन चले गए।

शेख हसीना सरकार के दौरान 2004 के ग्रेनेड हमले के मामले में उन्हें उम्रकैद की सजा सुनाई गई। BNP ने हमेशा इन मामलों को राजनीतिक साजिश बताया, जबकि सत्ताधारी पक्ष ने इसे कानून का परिणाम कहा।

लंबे समय तक ‘फरारी’ का टैग उनके नाम के साथ जुड़ा रहा। आलोचकों का कहना था कि वह देश से बाहर बैठकर राजनीति कर रहे हैं, जबकि समर्थकों का तर्क था कि वह राजनीतिक प्रतिशोध का शिकार हैं।

इन 17 वर्षों में बांग्लादेश की राजनीति में कई उतार-चढ़ाव आए, लेकिन तारिक का नाम कभी सुर्खियों से गायब नहीं हुआ।

कैसे बदली राजनीतिक हवा?

अगस्त 2025 में हुए छात्र आंदोलन ने बांग्लादेश की सियासत को झकझोर दिया। बढ़ती आर्थिक चुनौतियों, बेरोजगारी और शासन को लेकर असंतोष ने व्यापक विरोध का रूप ले लिया। हालात इतने बिगड़े कि शेख हसीना को देश छोड़ना पड़ा।

इसके बाद बनी अंतरिम सरकार ने चुनावों की घोषणा की। यही वह मोड़ था जहां राजनीतिक समीकरण बदलने लगे। BNP ने संगठित रणनीति के साथ मैदान में उतरकर खुद को स्थिर विकल्प के रूप में पेश किया।

तारिक रहमान की संभावित वापसी को पार्टी ने भावनात्मक मुद्दा बनाया। चुनाव प्रचार के दौरान उनके संदेशों को बड़े स्तर पर प्रसारित किया गया। समर्थकों ने उन्हें लोकतंत्र की लड़ाई लड़ने वाला नेता बताया, जिसने विदेशी धरती पर रहते हुए भी पार्टी को टूटने नहीं दिया।

नतीजों में BNP को प्रचंड बहुमत मिला और सत्ता में वापसी तय हो गई।

ढाका में जश्न, लेकिन नजरें दुनिया की

चुनाव परिणाम आते ही ढाका की सड़कों पर जश्न का माहौल था। पार्टी कार्यालयों के बाहर समर्थकों की भीड़ उमड़ पड़ी। झंडे लहराए गए, पटाखे फोड़े गए और ‘तारिक भाई’ के नारे गूंजने लगे।

हालांकि, इस जीत को लेकर अंतरराष्ट्रीय समुदाय की भी नजरें टिकी हैं। बांग्लादेश दक्षिण एशिया की राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है और यहां की स्थिरता क्षेत्रीय समीकरणों को प्रभावित करती है।

भारत के लिए क्या मायने?

तारिक रहमान का प्रधानमंत्री बनना भारत के लिए अहम माना जा रहा है।

  • पुराना इतिहास: BNP के पिछले कार्यकाल के दौरान भारत-बांग्लादेश संबंधों में कुछ तनाव देखने को मिला था, खासकर सुरक्षा और सीमा से जुड़े मुद्दों पर।
  • नया संकेत: हाल के बयानों में तारिक रहमान ने भारत के साथ संतुलित और रचनात्मक संबंधों की इच्छा जताई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा दी गई बधाई को नई शुरुआत का संकेत माना जा रहा है।

विश्लेषकों का मानना है कि क्षेत्रीय सहयोग, व्यापार और सुरक्षा के मुद्दों पर दोनों देशों के बीच तालमेल आने वाले समय में अहम होगा।

चुनौतियां कम नहीं

सत्ता संभालना जितना आसान दिखता है, उतना होता नहीं। तारिक रहमान के सामने कई बड़ी चुनौतियां खड़ी हैं:

  • आर्थिक संकट से जूझती अर्थव्यवस्था को स्थिर करना
  • बढ़ती महंगाई और बेरोजगारी पर नियंत्रण
  • कानून-व्यवस्था को मजबूत करना
  • अल्पसंख्यकों की सुरक्षा सुनिश्चित करना
  • अंतरराष्ट्रीय भरोसा कायम रखना

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि जनता ने बदलाव के लिए वोट दिया है, लेकिन उम्मीदों पर खरा उतरना असली परीक्षा होगी।

एक विरासत, एक परीक्षा

तारिक रहमान की राजनीतिक यात्रा सिर्फ व्यक्तिगत वापसी नहीं है, बल्कि एक विरासत की निरंतरता भी है। उनके पिता जियाउर रहमान और मां खालिदा जिया बांग्लादेश की राजनीति के बड़े नाम रहे हैं। अब जिम्मेदारी उनके कंधों पर है।

उनके समर्थक इसे लोकतंत्र की जीत बता रहे हैं। आलोचक अभी भी सवाल उठा रहे हैं कि क्या पुराने आरोपों की छाया पूरी तरह खत्म हो पाएगी?

राजनीति में वापसी अक्सर दूसरी पारी की तरह होती है—जहां हर कदम पहले से ज्यादा परखा जाता है।

निष्कर्ष: क्या नया अध्याय लिख पाएंगे तारिक?

17 साल लंबा इंतजार, निर्वासन का दौर और ‘फरारी’ का टैग—इन सबके बाद तारिक रहमान अब बांग्लादेश के शीर्ष नेतृत्व की ओर बढ़ रहे हैं। यह सिर्फ सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि एक राजनीतिक कहानी का नया अध्याय है।

अब असली सवाल यह है कि क्या वह देश को स्थिरता और विकास की नई दिशा दे पाएंगे, या पुराने विवाद और चुनौतियां फिर से रास्ता रोकेंगी?

ढाका से लेकर नई दिल्ली और वॉशिंगटन तक, सभी की नजरें इस नई सरकार पर टिकी हैं। आने वाले महीने तय करेंगे कि यह बदलाव स्थायी साबित होगा या बांग्लादेश की राजनीति एक और उथल-पुथल की ओर बढ़ेगी।

फिलहाल, इतिहास ने करवट ली है—और उसके केंद्र में हैं तारिक रहमान।