घर-घर पहुँची गैस, पर अब विदेशों पर निर्भरता ने बढ़ाया खतरा; क्या होगा अगर सप्लाई रुक गई?
भारत में पिछले दस वर्षों के दौरान रसोई से जुड़ी एक बड़ी सामाजिक और आर्थिक क्रांति देखने को मिली है। कभी गांवों और कस्बों में धुएं से भरे चूल्हे आम दृश्य हुआ करते थे, लेकिन आज स्थिति काफी बदल चुकी है। सरकार की योजनाओं और गैस कंपनियों के विस्तार की वजह से एलपीजी सिलेंडर अब करोड़ों घरों तक पहुंच चुका है।
आंकड़े बताते हैं कि पिछले एक दशक में भारत में एलपीजी उपभोक्ताओं की संख्या लगभग दोगुनी होकर 31 करोड़ से अधिक हो चुकी है। यह बदलाव केवल जीवनशैली में सुधार ही नहीं लाया, बल्कि महिलाओं के स्वास्थ्य और पर्यावरण पर भी सकारात्मक असर डालता दिखाई देता है।
लेकिन इस सफलता की कहानी के पीछे एक ऐसा पहलू भी है, जिस पर अब विशेषज्ञ चिंता जताने लगे हैं। एलपीजी का तेजी से बढ़ता इस्तेमाल भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिए नई चुनौती खड़ी कर रहा है।
खपत तेजी से बढ़ी, लेकिन उत्पादन पीछे रह गया
भारत में एलपीजी की मांग पिछले कुछ वर्षों में बहुत तेजी से बढ़ी है। शहरों के साथ-साथ ग्रामीण इलाकों में भी गैस सिलेंडर का इस्तेमाल सामान्य हो गया है।
हालांकि समस्या यह है कि देश में गैस का घरेलू उत्पादन उसी गति से नहीं बढ़ पाया। इसका परिणाम यह हुआ कि भारत को अपनी जरूरतें पूरी करने के लिए बड़ी मात्रा में गैस विदेशों से खरीदनी पड़ रही है।
ऊर्जा क्षेत्र से जुड़े आंकड़ों के अनुसार, साल 2014 में भारत लगभग 8 मिलियन टन एलपीजी आयात करता था। लेकिन अब यह आंकड़ा बढ़कर 18 मिलियन टन से अधिक हो चुका है।
यानी करीब दस साल में गैस आयात लगभग तीन गुना बढ़ गया है।
60 प्रतिशत से ज्यादा गैस विदेशों से आती है
विशेषज्ञों के मुताबिक आज भारत अपनी कुल एलपीजी जरूरत का 60 प्रतिशत से ज्यादा हिस्सा आयात करता है।
यह गैस मुख्य रूप से इन क्षेत्रों से आती है:
- मध्य पूर्व के देश
- अमेरिका
- कुछ यूरोपीय आपूर्तिकर्ता
इसका मतलब यह है कि भारत की रसोई काफी हद तक अंतरराष्ट्रीय बाजार और वैश्विक राजनीति पर निर्भर हो चुकी है।
अगर सप्लाई रुक जाए तो क्या होगा?
ऊर्जा विशेषज्ञों का कहना है कि इतनी बड़ी विदेशी निर्भरता जोखिम भरी हो सकती है। अगर किसी कारण से अंतरराष्ट्रीय सप्लाई बाधित होती है, तो इसका असर सीधे भारतीय घरों तक पहुंच सकता है।
1. वैश्विक तनाव का खतरा
दुनिया के कई हिस्सों में समय-समय पर भू-राजनीतिक तनाव देखने को मिलता है। अगर मध्य पूर्व में संघर्ष बढ़ता है या समुद्री व्यापार मार्ग प्रभावित होते हैं, तो गैस आपूर्ति बाधित हो सकती है।
ऐसी स्थिति में भारत को अचानक गैस की कमी का सामना करना पड़ सकता है।
2. सिलेंडर की कीमतों में उछाल
जब भी अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल या गैस की कीमत बढ़ती है, तो उसका असर भारत में भी दिखाई देता है।
अगर आयात महंगा हो जाता है, तो एलपीजी सिलेंडर की कीमतों में भी तेजी आ सकती है। कई बार घरेलू बजट पर इसका सीधा असर पड़ता है।
3. सप्लाई चेन में बाधा
अगर किसी बड़े निर्यातक देश में उत्पादन कम हो जाए या लॉजिस्टिक समस्याएं पैदा हो जाएं, तो गैस की सप्लाई में देरी हो सकती है।
हालांकि भारत के पास कुछ रणनीतिक भंडार (buffer stock) मौजूद होते हैं, लेकिन वे लंबे समय तक मांग पूरी करने के लिए पर्याप्त नहीं होते।
घरेलू उत्पादन क्यों सीमित है?
एलपीजी का उत्पादन भारत में मुख्य रूप से तेल रिफाइनिंग प्रक्रिया के दौरान एक सह-उत्पाद के रूप में होता है।
इसका मतलब यह है कि गैस का उत्पादन पूरी तरह स्वतंत्र रूप से नहीं बढ़ाया जा सकता। यह तेल उत्पादन और रिफाइनिंग क्षमता पर भी निर्भर करता है।
हालांकि पिछले कुछ वर्षों में भारत ने अपनी रिफाइनिंग क्षमता बढ़ाई है, लेकिन बढ़ती मांग के सामने यह अभी भी कम पड़ रही है।
सरकार विकल्पों की तलाश में
ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने के लिए सरकार अब एलपीजी के विकल्पों पर भी ध्यान दे रही है।
बायो-गैस और CBG
देश में कंप्रेस्ड बायो-गैस (CBG) को बढ़ावा देने के लिए कई परियोजनाएं शुरू की गई हैं। इसका उद्देश्य जैविक कचरे से गैस बनाकर ऊर्जा उत्पादन करना है।
एथेनॉल और हरित ईंधन
सरकार एथेनॉल मिश्रण कार्यक्रम और अन्य हरित ऊर्जा स्रोतों को भी बढ़ावा दे रही है, ताकि आयात पर निर्भरता धीरे-धीरे कम की जा सके।
हालांकि विशेषज्ञ मानते हैं कि इन विकल्पों को पूरी तरह प्रभावी बनने में अभी समय लगेगा।
सप्लाई के स्रोतों में विविधता
सरकार ने एक और महत्वपूर्ण कदम उठाया है—गैस सप्लाई के स्रोतों को विविध बनाना।
पहले भारत मुख्य रूप से खाड़ी देशों पर निर्भर था, लेकिन अब अमेरिका, नॉर्वे और अन्य देशों से भी दीर्घकालिक समझौते किए जा रहे हैं।
इस रणनीति का उद्देश्य यह है कि अगर किसी एक क्षेत्र में समस्या आती है, तो दूसरे स्रोत से सप्लाई जारी रह सके।
उज्ज्वला योजना का प्रभाव
भारत में एलपीजी उपभोग बढ़ने के पीछे एक बड़ा कारण प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना भी है।
इस योजना के तहत करोड़ों गरीब परिवारों को मुफ्त गैस कनेक्शन दिए गए, जिससे ग्रामीण इलाकों में भी गैस का इस्तेमाल तेजी से बढ़ा।
इससे महिलाओं को धुएं से राहत मिली और स्वास्थ्य पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़ा।
भविष्य की चुनौती
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को आने वाले वर्षों में दो बड़ी चुनौतियों का सामना करना होगा:
- बढ़ती गैस मांग को पूरा करना
- विदेशी निर्भरता को कम करना
इसके लिए घरेलू उत्पादन बढ़ाने के साथ-साथ वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों पर तेजी से काम करना जरूरी होगा।
निष्कर्ष
भारत में एलपीजी की पहुंच बढ़ना निश्चित रूप से एक बड़ी उपलब्धि है। इससे करोड़ों परिवारों की जिंदगी आसान हुई है और पारंपरिक ईंधन पर निर्भरता कम हुई है।
लेकिन इसके साथ ही यह सवाल भी महत्वपूर्ण हो गया है कि क्या भारत अपनी रसोई की ऊर्जा जरूरतों के लिए लंबे समय तक विदेशों पर निर्भर रह सकता है।
अगर देश को सच में ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनना है, तो घरेलू उत्पादन, वैकल्पिक ईंधन और ऊर्जा नीति में संतुलन बनाना बेहद जरूरी होगा।
भारत की रसोई अब गैस पर चल रही है—लेकिन भविष्य में यह गैस कितनी सुरक्षित और आत्मनिर्भर होगी, यह आने वाले वर्षों की नीतियों पर निर्भर करेगा।
