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इतिहास में पहली बार: सुप्रीम कोर्ट में क्या बोलीं ममता बनर्जी, जानिए पूरी इनसाइड स्टोरी!

भारतीय लोकतंत्र, न्यायपालिका और राजनीति—तीनों के इतिहास में आज का दिन एक असाधारण मोड़ के रूप में दर्ज हो गया। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी आज सिर्फ एक राजनीतिक नेता के रूप में नहीं, बल्कि एक आम नागरिक और प्रशिक्षित वकील के तौर पर देश की सर्वोच्च अदालत में खड़ी नजर आईं। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में न केवल अपनी मौजूदगी दर्ज कराई, बल्कि खुद खड़े होकर अपना पक्ष भी रखा।

स्वतंत्र भारत के इतिहास में यह संभवतः पहला मौका है जब किसी राज्य की सिटिंग मुख्यमंत्री ने सुप्रीम कोर्ट के कोर्ट रूम में अपने मामले की पैरवी खुद की हो। यह दृश्य अपने आप में इतना असाधारण था कि अदालत के बाहर से लेकर राजनीतिक गलियारों तक इसकी चर्चा दिनभर गूंजती रही।

सुप्रीम कोर्ट का वो पल, जिसने सबको चौंका दिया

सुबह से ही सुप्रीम कोर्ट के कोर्ट रूम नंबर 1 में हलचल थी। बंगाल में मतदाता सूची के ‘विशेष गहन संशोधन’ (Special Intensive Revision – SIR) से जुड़ा मामला सूचीबद्ध था, लेकिन किसी को अंदाजा नहीं था कि सुनवाई के दौरान इतिहास लिखा जाएगा।

जैसे ही मामला मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ के सामने आया, ममता बनर्जी खुद उठीं और दलील देने की अनुमति मांगी। सफेद साड़ी, गले में काला शॉल और चेहरे पर आत्मविश्वास—न कोई वकील का पारंपरिक गाउन, न ही राजनीतिक भाषण का अंदाज। यह एक ऐसी मुख्यमंत्री थीं, जो सीधे न्यायपालिका से संवाद कर रही थीं।

उन्होंने अपनी बात की शुरुआत एक भावनात्मक लेकिन सधे हुए वाक्य से की—
“जब न्याय बंद दरवाजों के पीछे रोता है, तब एक मुख्यमंत्री को खुद अदालत का दरवाजा खटखटाना पड़ता है।”

कोर्ट रूम में कुछ पल के लिए खामोशी छा गई। यह कोई आम सुनवाई नहीं थी।

आखिर क्यों सुप्रीम कोर्ट पहुंचीं ममता बनर्जी?

मामला पश्चिम बंगाल में चल रहे मतदाता सूची के विशेष संशोधन से जुड़ा है। ममता बनर्जी और उनकी पार्टी का आरोप है कि चुनाव से ठीक पहले यह प्रक्रिया लोकतांत्रिक व्यवस्था को प्रभावित कर सकती है।

ममता ने अपनी दलीलों में साफ किया कि उनका उद्देश्य किसी संस्था पर हमला करना नहीं, बल्कि आम मतदाता के अधिकारों की रक्षा करना है। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र की आत्मा वोटर है और अगर उसका नाम ही सूची से गायब हो जाए, तो चुनाव का क्या मतलब रह जाता है?

ममता बनर्जी की दलीलें: सीधे सवाल, तीखे आरोप

करीब 15 से 20 मिनट तक चली बहस में ममता बनर्जी ने एक-एक बिंदु पर चुनाव आयोग की प्रक्रिया को कठघरे में खड़ा किया।

  • 1. क्या सिर्फ बंगाल ही निशाने पर है?

    ममता ने सवाल उठाया कि जब देश के कई राज्यों में चुनावी गतिविधियां चल रही हैं, तो इतना व्यापक संशोधन सिर्फ पश्चिम बंगाल में ही क्यों? उन्होंने असम का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां समान परिस्थितियों के बावजूद ऐसी प्रक्रिया क्यों नहीं अपनाई गई।

  • 2. माइक्रो-ऑब्जर्वर्स पर सवाल

    उन्होंने आरोप लगाया कि माइक्रो-ऑब्जर्वर्स की नियुक्ति के जरिए स्थानीय प्रशासन और आम लोगों की भूमिका को कमजोर किया जा रहा है। उनका कहना था कि यह प्रक्रिया मतदाताओं की आवाज को ‘बुलडोज’ करने जैसी है।

  • 3. नाम काटने का तरीका

    ममता ने कोर्ट को बताया कि कैसे मामूली स्पेलिंग मिस्टेक के आधार पर मतदाता सूची से नाम हटाए जा रहे हैं। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि ‘Khan’ को ‘Kha’ लिख देने जैसी गलतियों के चलते लाखों लोगों का वोटिंग अधिकार खतरे में पड़ सकता है।

  • 4. आधार कार्ड की अनदेखी

    सबसे बड़ा सवाल आधार कार्ड को लेकर था। ममता का आरोप था कि सत्यापन प्रक्रिया में आधार कार्ड को स्वीकार नहीं किया जा रहा, जबकि यह देश का सबसे व्यापक पहचान पत्र है। इससे गरीब, प्रवासी और ग्रामीण मतदाताओं को भारी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।

जजों का रुख: गंभीरता से सुनी गई हर बात

कोर्ट रूम में मौजूद वकीलों और पत्रकारों के मुताबिक, बेंच ने ममता बनर्जी की दलीलों को बेहद ध्यान से सुना। बीच में कोई अनावश्यक टोका-टोकी नहीं हुई।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने टिप्पणी करते हुए कहा कि “किसी भी निर्दोष नागरिक का नाम मतदाता सूची से बाहर नहीं होना चाहिए।”
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया की शुद्धता सर्वोच्च प्राथमिकता है।

सुप्रीम कोर्ट ने मामले की गंभीरता को देखते हुए चुनाव आयोग को नोटिस जारी किया और 10 फरवरी 2026 तक विस्तृत जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया।

कानूनी दुनिया में हलचल: मुख्यमंत्री या वकील?

ममता बनर्जी का यह कदम सिर्फ राजनीतिक नहीं, बल्कि कानूनी दुनिया के लिए भी चौंकाने वाला था। बहुत कम लोग जानते हैं कि ममता बनर्जी के पास कानून की औपचारिक डिग्री है, जो उन्होंने कोलकाता के जोगेश चंद्र चौधरी लॉ कॉलेज से हासिल की थी।

आज उन्होंने उसी कानूनी प्रशिक्षण को अदालत में जीवंत कर दिया। कुछ वरिष्ठ वकीलों का मानना है कि यह संविधान के भीतर रहकर किया गया एक साहसिक प्रयोग है, जबकि कुछ इसे एक मजबूत राजनीतिक संदेश के रूप में देख रहे हैं।

राजनीति से आगे की कहानी

इस पूरे घटनाक्रम को सिर्फ एक कानूनी लड़ाई के रूप में देखना अधूरा होगा। 2026 के बंगाल विधानसभा चुनाव से पहले यह कदम ममता बनर्जी की राजनीतिक रणनीति का अहम हिस्सा माना जा रहा है।

उन्होंने यह संकेत देने की कोशिश की है कि वे केवल मंचों से भाषण देने वाली नेता नहीं हैं, बल्कि जरूरत पड़ने पर खुद अदालत में उतरकर लड़ने को तैयार हैं।

उनके समर्थकों के लिए यह ‘दीदी’ का नया रूप था—निडर, मुखर और सीधे सिस्टम से टकराने वाला।

लोकतंत्र के लिए क्या मायने रखता है यह दिन?

आज की सुनवाई ने कई बड़े सवाल खड़े किए हैं—

  • क्या मतदाता सूची संशोधन की प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी है?
  • क्या आम नागरिक के पास अपनी आवाज उठाने के पर्याप्त साधन हैं?
  • और क्या लोकतंत्र में सत्ता में बैठे लोग भी खुद को ‘आम नागरिक’ मान सकते हैं?

ममता बनर्जी की अदालत में मौजूदगी ने इन सवालों को नई धार दी है।

निष्कर्ष: एक केस नहीं, एक संदेश

आज सुप्रीम कोर्ट में जो हुआ, वह सिर्फ एक कानूनी बहस नहीं थी। यह एक राजनीतिक, संवैधानिक और नैतिक संदेश था। ममता बनर्जी ने यह दिखाने की कोशिश की कि लोकतंत्र की रक्षा सिर्फ भाषणों से नहीं, बल्कि संवैधानिक संस्थाओं के सामने खड़े होकर भी की जाती है।

आने वाले दिनों में चुनाव आयोग का जवाब और कोर्ट का रुख तय करेगा कि इस ऐतिहासिक सुनवाई का असर कितना दूर तक जाएगा। लेकिन इतना तय है—आज का दिन भारतीय राजनीति और न्यायपालिका के इतिहास में लंबे समय तक याद रखा जाएगा।