ऑपरेशन ‘हेरफ’ (Herof) का धमाका! 177 आतंकी ढेर या गृहयुद्ध की शुरुआत?
पाकिस्तान इस वक्त जिस हालात से गुजर रहा है, उसे महज आर्थिक संकट या राजनीतिक अस्थिरता कहना सच्चाई को कम करके आंकना होगा। असली आग उसके सबसे बड़े और सबसे उपेक्षित प्रांत बलूचिस्तान में धधक रही है। वहां हालात इतने बिगड़ चुके हैं कि अब सवाल सिर्फ अशांति का नहीं, बल्कि बलूचिस्तान की आजादी और पाकिस्तान के भविष्य का बन गया है।
आज बलूचिस्तान में जो कुछ हो रहा है, वह अचानक नहीं हुआ। इसकी जड़ें 1948 में छिपी हैं—उस साल, जिसे बलूच इतिहास में आज भी ‘जिन्ना का धोखा’ कहा जाता है।
1948: जब वादे टूटे और बंदूकें बोलीं
15 अगस्त 1947 के बाद जब उपमहाद्वीप का बंटवारा हुआ, तब बलूचिस्तान की पहचान कैलत रियासत के रूप में थी। ऐतिहासिक दस्तावेज बताते हैं कि उस समय बलूचिस्तान ने खुद को एक स्वतंत्र देश घोषित किया था। हैरानी की बात यह है कि उस आज़ादी को पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना ने भी शुरुआती तौर पर स्वीकार किया था।
लेकिन यह सहमति ज्यादा दिन नहीं चली।
महज 227 दिनों के भीतर हालात बदल गए। 27 मार्च 1948 को पाकिस्तानी सेना क्वेटा में दाखिल हुई और बंदूक की नोंक पर बलूचिस्तान को पाकिस्तान में मिला लिया गया। बलूच नेताओं का आरोप है कि यह कोई विलय नहीं, बल्कि एक सीधा सैन्य कब्जा था।
यही वह मोड़ था, जहां से अविश्वास, गुस्सा और विद्रोह की कहानी शुरू हुई।
77 साल बाद फिर क्यों उबल पड़ा बलूचिस्तान?
आज, 2026 की शुरुआत में, बलूचिस्तान एक बार फिर आग में जल रहा है। फर्क बस इतना है कि अब यह आग ज्यादा संगठित, ज्यादा घातक और ज्यादा अंतरराष्ट्रीय हो चुकी है।
बलूचिस्तान में गृहयुद्ध जैसे हालात बन चुके हैं। बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी (BLA) ने हाल ही में ‘ऑपरेशन हेरफ क्या है’—इस सवाल को पूरी दुनिया के सामने रख दिया है। ऑपरेशन हेरफ के तहत बलूच लड़ाकों ने पाकिस्तानी सैन्य ठिकानों, काफिलों और इंफ्रास्ट्रक्चर पर समन्वित हमले किए हैं।
यह अब छिटपुट हिंसा नहीं रही, बल्कि साफ तौर पर पाकिस्तानी सेना बनाम बलूच बागी की खुली जंग बनती जा रही है।
बलूचिस्तान का खजाना और चीन: संघर्ष की असली वजह?
बलूचिस्तान को अक्सर पाकिस्तान का पिछड़ा इलाका बताया जाता है, लेकिन सच्चाई इसके ठीक उलट है। यह इलाका प्राकृतिक संसाधनों से भरा हुआ है।
- विशाल गैस भंडार
- सोना, तांबा और रेयर मिनरल्स
- अरब सागर से सटी रणनीतिक तटरेखा
यही वजह है कि बलूचिस्तान का खजाना और चीन आज एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं।
चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (CPEC) और ग्वादर पोर्ट को बीजिंग अपनी रणनीतिक जीवनरेखा मानता है। बलूचों का आरोप है कि उनकी जमीनें छीनी जा रही हैं, मुआवजा नहीं दिया जा रहा और सुरक्षा के नाम पर सेना उनके गांवों पर कब्जा कर रही है।
बलूचों की नजर में यह विकास नहीं, बल्कि एक नया उपनिवेशवाद है।
‘लापता लोग’: हर घर की कहानी
बलूचिस्तान में शायद ही कोई ऐसा परिवार हो जिसने किसी अपने को न खोया हो। हजारों बलूच युवाओं के लापता होने की रिपोर्टें दशकों से सामने आती रही हैं।
परिवारों का आरोप है कि पाकिस्तानी सुरक्षा एजेंसियां युवाओं को उठा ले जाती हैं और फिर न तो उनका कोई पता चलता है, न कोई जवाब मिलता है। कई मामलों में बाद में क्षत-विक्षत शव मिलने की खबरें भी सामने आई हैं।
यही घटनाएं बलूच युवाओं को हथियार उठाने के लिए मजबूर कर रही हैं।
अमेरिका बलूचिस्तान डील: नई सियासत, नया खेल?
जहां चीन बलूचिस्तान में अपनी पकड़ मजबूत करना चाहता है, वहीं अब अमेरिका बलूचिस्तान डील की चर्चाएं तेज हो गई हैं।
अमेरिकी रणनीतिक हलकों में बलूचिस्तान को:
- ईरान और अफगानिस्तान पर नजर रखने का अहम ठिकाना
- और खनिज संसाधनों का संभावित स्रोत
माना जा रहा है कि पाकिस्तान अपने बढ़ते कर्ज के बदले बलूचिस्तान की खदानों में अमेरिकी निवेश को हरी झंडी देने पर विचार कर रहा है। यह खबर बलूच विद्रोहियों के लिए एक और चेतावनी की तरह है—कि उनकी जमीन फिर किसी और के हाथों सौपी जा रही है।
मौजूदा हालात: युद्ध अब छिपा नहीं रहा
पिछले 48 घंटों में हालात और बिगड़ गए हैं। स्थानीय रिपोर्ट्स के मुताबिक:
- 170 से ज्यादा लड़ाके मारे गए
- दर्जनों पाकिस्तानी सैनिक हताहत
- क्वेटा, तुर्बत और ग्वादर में कर्फ्यू जैसे हालात
मानवाधिकार संगठनों ने चेतावनी दी है कि अगर राजनीतिक समाधान नहीं निकाला गया, तो यह संघर्ष अंतरराष्ट्रीय संकट में बदल सकता है।
क्या पाकिस्तान खो देगा अपना सबसे बड़ा प्रांत?
आज बलूचिस्तान सिर्फ पाकिस्तान की आंतरिक समस्या नहीं रहा। यह चीन, अमेरिका और पूरे दक्षिण एशिया की स्थिरता से जुड़ा मुद्दा बन चुका है।
77 साल पहले जिन्ना का धोखा कहे जाने वाले फैसले ने जिस आग को जन्म दिया था, वह अब एक ऐसे ज्वालामुखी में बदल चुकी है जिसे दबाना शायद पाकिस्तान के बस में नहीं रहा।
सवाल यह नहीं है कि बलूचिस्तान में हालात बिगड़ेंगे या नहीं—
सवाल यह है कि दुनिया इसे मानवीय संकट के रूप में देखेगी या सिर्फ संसाधनों के नक्शे की तरह?
