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UGC के नए नियम ने सबको चौंकाया, वो 3 बातें जो सरकार आपसे छुपा रही है!

देश के विश्वविद्यालय परिसरों में इन दिनों पढ़ाई से ज़्यादा चर्चा भविष्य की है। क्लासरूम, लाइब्रेरी और हॉस्टल—हर जगह एक ही सवाल गूंज रहा है: “क्या हमारे अधिकार छीने जा रहे हैं?”

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) द्वारा प्रस्तावित Promotion of Equity Regulations 2026 ने देश के उच्च शिक्षण संस्थानों में ऐसा तनाव पैदा कर दिया है, जो लंबे समय बाद देखने को मिल रहा है।

जहाँ सरकार और UGC इसे शिक्षा व्यवस्था में सुधार की दिशा में एक ज़रूरी कदम बता रहे हैं, वहीं छात्र संगठनों का आरोप है कि ये नियम आरक्षण व्यवस्था को कमजोर कर सकते हैं और हज़ारों शोधार्थियों के सपनों पर ब्रेक लगा सकते हैं। नतीजा—देशभर के कैंपसों में प्रदर्शन, धरने और नारेबाज़ी।

विवाद की जड़: नियमों की भाषा या नीयत?

UGC के नए प्रस्तावित नियम मुख्य रूप से दो बातों पर केंद्रित हैं—

  • कॉलेज और विश्वविद्यालयों में प्रोफेसरों की भर्ती प्रक्रिया
  • कैंपस में समानता (Equity) और भेदभाव रोकने के उपाय

लेकिन छात्रों का कहना है कि नियमों की भाषा अस्पष्ट है और यही अस्पष्टता सबसे बड़ा खतरा बन गई है।

सबसे बड़ा सवाल: आरक्षण का क्या होगा?

छात्र संगठनों का आरोप है कि नए नियमों में SC, ST और OBC आरक्षण को लेकर साफ दिशा-निर्देश नहीं दिए गए हैं। उन्हें डर है कि यह अस्पष्टता भविष्य में डी-रिजर्वेशन का रास्ता खोल सकती है।

दिल्ली विश्वविद्यालय के एक शोध छात्र ने कहा:

“जब कानून साफ नहीं होता, तो सबसे ज़्यादा नुकसान हाशिए के छात्रों को ही होता है।”

PhD धारकों की चिंता: नया ‘इंडेक्स’ क्यों डराता है?

UGC ने प्रोफेसरों की भर्ती के लिए एक नया परफॉर्मेंस इंडेक्स प्रस्तावित किया है, जिसमें:

  • रिसर्च
  • पब्लिकेशन
  • इंटरव्यू
  • एकेडमिक स्कोर

को नए तरीके से जोड़ा जाएगा।

PhD कर चुके छात्रों का कहना है कि:

  • वर्षों की रिसर्च का मूल्य कम हो जाएगा
  • इंटरव्यू को ज़्यादा वेटेज मिलने से भाई-भतीजावाद बढ़ेगा
  • चयन प्रक्रिया ज़्यादा सब्जेक्टिव हो जाएगी

जेएनयू के एक छात्र नेता ने कहा:

“अगर इंटरव्यू ही सब कुछ तय करेगा, तो मेरिट और सामाजिक न्याय का क्या होगा?”

कैंपस से सड़क तक: छात्रों की ‘बगावत’

दिल्ली विश्वविद्यालय, JNU, इलाहाबाद विश्वविद्यालय, हैदराबाद सेंट्रल यूनिवर्सिटी—लगभग हर बड़े कैंपस में छात्र संगठनों ने संयुक्त मोर्चा खोल दिया है।

छात्रों की प्रमुख मांगें:
  • आरक्षण पर स्पष्ट और लिखित गारंटी
  • इंटरव्यू वेटेज कम किया जाए
  • भर्ती प्रक्रिया में पारदर्शिता
  • नियमों को लागू करने से पहले छात्रों से संवाद

सरकार और UGC का जवाब

UGC का कहना है कि:

  • ये नियम किसी भी तरह से आरक्षण खत्म नहीं करते
  • उद्देश्य केवल शिक्षण गुणवत्ता सुधारना है
  • भर्ती प्रक्रिया को ज्यादा पारदर्शी और जवाबदेह बनाना मकसद है

छात्रों का जवाब:

“जब तक लिखित भरोसा नहीं, तब तक भरोसा नहीं।”

भर्ती प्रक्रिया पर ब्रेक

इस विवाद के चलते राष्ट्रव्यापी भर्ती प्रभावित हुई है:

  • कई विश्वविद्यालयों ने भर्ती रोक दी
  • हज़ारों पद खाली पड़े हैं
  • गेस्ट फैकल्टी के भरोसे पढ़ाई चल रही है

मामला पहुंचा सुप्रीम कोर्ट

UGC के नए नियमों को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में PIL दाखिल की गई है।

कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार:

  • कोर्ट की टिप्पणी आगे की दिशा तय करेगी
  • तब तक अनिश्चितता बनी रहेगी

“संसद तक गूंजेगी आवाज”

छात्र संगठनों ने चेतावनी दी है कि यदि मांगें नहीं मानी गईं तो:

  • संसद घेराव
  • देशव्यापी प्रदर्शन
  • क्लास और परीक्षाओं का बहिष्कार

सोशल मीडिया पर आंदोलन उग्र है:

  • #SaveHigherEducation
  • #UGCRules2026
  • #StudentsProtest

आगे क्या?

अब सवाल यही है:

  • संवाद होगा या टकराव?
  • नियमों में संशोधन होगा?
  • या मुद्दा सड़कों और अदालत के बीच फंसा रहेगा?

एक बात साफ है: यह केवल नियमों की लड़ाई नहीं, बल्कि भारत की उच्च शिक्षा की दिशा तय करने वाला संघर्ष है।