‘गाजा पीस बोर्ड’ : 35 देशों ने थामी अमेरिका की उंगली, जानें भारत का क्या है स्टैंड?
दुनिया के सबसे जटिल और संवेदनशील संघर्षों में गिने जाने वाले इजरायल–हमास युद्ध को खत्म करने के लिए अमेरिका ने एक बार फिर बड़ा कूटनीतिक पासा फेंका है।
दावोस में चल रही विश्व आर्थिक मंच (WEF) की बैठक के दौरान अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने औपचारिक तौर पर ‘गाजा पीस बोर्ड’ (Gaza Peace Board) की घोषणा कर दी।
सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि घोषणा के कुछ ही घंटों के भीतर 35 ताकतवर देशों ने इस बोर्ड में शामिल होने की सहमति जता दी।
अब पूरी दुनिया की नजरें एक सवाल पर टिक गई हैं—
क्या भारत इस अमेरिकी शांति पहल का हिस्सा बनेगा?
ट्रंप का ‘मास्टरस्ट्रोक’: शांति के बदले सुरक्षा और व्यापार
डोनाल्ड ट्रंप ने इस पहल को “मध्य-पूर्व में शांति का आखिरी मौका” बताया है।
उनका साफ संदेश है—जो देश इस बोर्ड का हिस्सा बनेगा, उसे:
- मध्य-पूर्व में व्यापारिक प्राथमिकता
- अमेरिका की ओर से सुरक्षा सहयोग
- और वैश्विक मंच पर रणनीतिक समर्थन मिलेगा
बताया जा रहा है कि इस 35 देशों की सूची में
ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, इटली और कई खाड़ी देश शामिल हैं।
ट्रंप ने हमास को कड़ी चेतावनी देते हुए कहा:
“यह बोर्ड शांति का अंतिम अवसर है। अगर हथियार नहीं डाले गए, तो परिणाम भुगतने होंगे।”
इस बयान के बाद कूटनीतिक हलकों में हलचल और तेज हो गई है।
भारत का रुख: समर्थन भी, संतुलन भी
भारत का नाम सामने आते ही चर्चा और गहरी हो जाती है।
भारत हमेशा से इजरायल–फिलिस्तीन मुद्दे पर ‘टू-स्टेट सॉल्यूशन’ का समर्थक रहा है।
लेकिन ट्रंप के इस नए ‘पीस बोर्ड’ को लेकर भारत फिलहाल ‘वेट एंड वॉच’ मोड में नजर आ रहा है।
भारत क्यों सोच-समझकर कदम रखेगा?
- स्वतंत्र विदेश नीति
भारत किसी एक देश के दबाव में फैसला लेने के बजाय संतुलित और स्वतंत्र रुख अपनाता है। - मानवीय दृष्टिकोण
भारत पहले भी गाजा के लिए मानवीय सहायता भेजता रहा है। संभव है कि भारत शांति प्रयासों का समर्थन करे, लेकिन किसी सैन्य या दबाव-आधारित मंच से दूरी बनाए। - अरब और इजरायल—दोनों से रिश्ते
भारत के इजरायल और अरब देशों दोनों से मजबूत संबंध हैं। ऐसे में भारत कोई ऐसा कदम नहीं उठाएगा जिससे उसका रणनीतिक संतुलन बिगड़े।
पाकिस्तान में बढ़ी बेचैनी
जैसे-जैसे इस बोर्ड में भारत की संभावित भूमिका की चर्चा तेज हुई है,
वैसे-वैसे पाकिस्तान में बेचैनी साफ दिखने लगी है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि:
अगर भारत इस वैश्विक शांति प्रक्रिया में अहम भूमिका निभाता है,
तो अंतरराष्ट्रीय मंच पर पाकिस्तान की प्रासंगिकता और कमजोर पड़ सकती है।
अब आगे क्या?
भारत के विदेश मंत्रालय (MEA) की ओर से जल्द ही इस मुद्दे पर आधिकारिक प्रतिक्रिया आने की उम्मीद है।
सवाल यही है—
क्या भारत 36वें सदस्य के रूप में ट्रंप की इस पहल में शामिल होगा?
या फिर भारत शांति समर्थक लेकिन संतुलित दूरी की नीति अपनाएगा?
आने वाले कुछ दिन तय करेंगे कि
‘गाजा पीस बोर्ड’ इतिहास बनेगा या सिर्फ एक और कूटनीतिक प्रयोग।
