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आखिर क्यों ट्रंप ने भारत को ‘बोर्ड ऑफ पीस’ में बुलाया? पर्दे के पीछे की ये कहानी आपको चौंका देगी!

मध्य-पूर्व की राजनीति में एक बार फिर हलचल तेज़ हो गई है। अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने गाजा पट्टी में स्थिरता लाने के प्रयासों के तहत एक ‘बोर्ड ऑफ पीस’ (Board of Peace) के गठन का सुझाव दिया है। इस प्रस्ताव की सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि ट्रंप ने इसमें भारत और पाकिस्तान दोनों को शामिल करने की बात कही है।

इस घटनाक्रम ने अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक गलियारों में नई बहस छेड़ दी है—खासतौर पर भारत को लेकर, जिसके इजरायल के साथ मजबूत और रणनीतिक संबंध माने जाते हैं।

क्यों अहम है ट्रंप का यह प्रस्ताव?

विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप का यह कदम सिर्फ शांति की अपील नहीं, बल्कि इसके पीछे गहरे रणनीतिक संकेत छिपे हो सकते हैं। बदलती वैश्विक राजनीति और अमेरिका के दीर्घकालिक हितों के संदर्भ में इस प्रस्ताव को देखा जा रहा है।

ट्रंप की रणनीति के पीछे क्या हो सकते हैं बड़े कारण?

क्षेत्रीय स्थिरता में वैश्विक साझेदारी

अमेरिका यह संदेश देना चाहता है कि मध्य-पूर्व की शांति अब केवल पश्चिमी देशों की जिम्मेदारी नहीं है।
भारत की बढ़ती वैश्विक भूमिका और उसकी संतुलित विदेश नीति उसे इस मंच पर एक महत्वपूर्ण खिलाड़ी बना सकती है।

भारत की कूटनीतिक साख का उपयोग

हाल के वर्षों में भारत ने कई जटिल वैश्विक मुद्दों पर संवाद और संतुलन की नीति अपनाकर अपनी विश्वसनीयता साबित की है।
गाजा जैसे संवेदनशील मुद्दे पर भारत की भूमिका को रचनात्मक मध्यस्थ के रूप में देखा जा सकता है।

इजरायल और अरब देशों—दोनों से मजबूत रिश्ते

भारत की खासियत यह है कि उसके इजरायल के साथ भी मजबूत संबंध हैं, और साथ ही कई अरब देशों के साथ भी गहरे कूटनीतिक रिश्ते बने हुए हैं।
यह संतुलन भारत को शांति वार्ता के लिए एक संभावित सेतु बना सकता है।

भारत के सामने कौन-सी बड़ी चुनौतियां होंगी?

इस प्रस्ताव पर फैसला लेना भारत के लिए आसान नहीं होगा। कई संवेदनशील पहलुओं पर विचार जरूरी है—

मध्य-पूर्व की जटिल राजनीति

यह इलाका दशकों से संघर्षों से घिरा रहा है। किसी भी पहल में कदम रखने से पहले भारत को अपने दीर्घकालिक हितों और क्षेत्रीय समीकरणों को संतुलित करना होगा।

पाकिस्तान के साथ एक मंच

भारत और पाकिस्तान को एक ही शांति मंच पर लाना अपने आप में एक कूटनीतिक चुनौती है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

भारत की भूमिका और सीमाएं

अगर भारत इस बोर्ड में शामिल होता है, तो उसका जनादेश क्या होगा?
मध्यस्थ, पर्यवेक्षक या केवल सलाहकार—यह स्पष्ट होना बेहद जरूरी होगा।

भारत सरकार का रुख क्या है?

फिलहाल भारत सरकार ने इस प्रस्ताव पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नही