तेल की कीमतों में फिर उबाल? क्या भारत को भी लगेगा झटका?
दुनिया की सबसे अहम कमोडिटी कच्चा तेल (Crude Oil) एक बार फिर सुर्खियों में है। ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव ने वैश्विक बाजारों में हलचल मचा दी है और निवेशकों से लेकर आम उपभोक्ताओं तक की नजर अब सिर्फ एक सवाल पर टिकी है—
क्या तेल फिर महंगा होने वाला है?
क्या है विवाद की जड़?
हाल के दिनों में अमेरिका ने ईरान पर तेल निर्यात और परमाणु गतिविधियों को लेकर सख्त बयान और नए प्रतिबंधों के संकेत दिए हैं। जवाब में ईरान ने भी हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) की सुरक्षा को लेकर चेतावनी जारी की है।
यही वह समुद्री रास्ता है, जहां से दुनिया का करीब 20% तेल सप्लाई होता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर इस रास्ते पर जरा-सी भी रुकावट आई, तो कच्चे तेल की कीमतें तेजी से ऊपर जा सकती हैं।
ग्लोबल मार्केट में क्यों बढ़ी बेचैनी?
- ईरान-अमेरिका तनाव के संकेत मिलते ही
- ब्रेंट क्रूड और WTI में तेजी देखी गई
- शेयर बाजारों में उतार-चढ़ाव बढ़ा
- डॉलर मजबूत हुआ और गोल्ड की मांग बढ़ी
एनर्जी एक्सपर्ट्स का कहना है कि बाजार अभी “Risk Mode” में है—यानी जरा-सी नकारात्मक खबर, कीमतों में बड़ा उछाल ला सकती है।
🇮🇳 भारत पर कितना असर पड़ेगा?
भारत अपनी तेल जरूरतों का 85% से ज्यादा आयात करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय कीमतों में उछाल का सीधा असर
- पेट्रोल-डीजल के दाम
- महंगाई (Inflation)
- रुपये की मजबूती
पर पड़ सकता है।
हालांकि फिलहाल भारत रूस, सऊदी अरब और अन्य देशों से तेल खरीदकर जोखिम को संतुलित करने की कोशिश कर रहा है। सरकार के पास रणनीतिक तेल भंडार (Strategic Reserves) भी हैं, जो कुछ समय तक राहत दे सकते हैं।
आगे क्या होगा?
विशेषज्ञों के मुताबिक तीन संभावनाएं हैं:
- तनाव कम हुआ – तेल की कीमतें स्थिर रह सकती हैं
- हॉर्मुज़ पर खतरा बढ़ा – तेल $100 प्रति बैरल के पार जा सकता है
- लंबा टकराव – वैश्विक महंगाई और मंदी का खतरा
अभी बाजार पूरी तरह खबरों और कूटनीतिक संकेतों पर टिका हुआ है।
आम आदमी को क्या करना चाहिए?
- पेट्रोल-डीजल पर सरकार के फैसलों पर नजर रखें
- लॉन्ग-टर्म बजट प्लानिंग करें
- महंगाई से जुड़े संकेतों को हल्के में न लें
निष्कर्ष
ईरान-अमेरिका विवाद सिर्फ दो देशों का मसला नहीं, बल्कि पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को प्रभावित करने वाला संकट बन सकता है।
भारत पर इसका असर होगा या नहीं—यह आने वाले दिनों की कूटनीति तय करेगी।
फिलहाल इतना तय है कि तेल की कीमतें एक बार फिर ग्लोबल टेंशन का थर्मामीटर बन चुकी हैं।
