बर्फ की चादर के नीचे छिपा है कौन सा राज? जिसके लिए ग्रीनलैंड को हथियाना चाहते हैं ट्रंप।
दुनिया का सबसे बड़ा द्वीप ग्रीनलैंड अचानक वैश्विक राजनीति का सबसे गर्म मुद्दा बन गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ग्रीनलैंड को अमेरिका में शामिल करने की इच्छा जताने के बाद यह मामला अब सिर्फ कूटनीति तक सीमित नहीं रहा, बल्कि सैन्य टकराव की आहट तक पहुंच गया है।
लेकिन सवाल यह है—बर्फ से ढके, कम आबादी वाले इस द्वीप में ऐसा क्या है कि अमेरिका इसे पाने के लिए पूरी दुनिया से भिड़ने को तैयार दिख रहा है?
1. बर्फ के नीचे दबा ‘सफेद सोना’ और दुर्लभ खनिजों का खजाना
विशेषज्ञों के मुताबिक ग्लोबल वार्मिंग ग्रीनलैंड की किस्मत बदल रही है। जैसे-जैसे बर्फ पिघल रही है, वैसे-वैसे धरती के नीचे छिपे रेयर अर्थ मेटल्स, सोना, हीरा, यूरेनियम और लोहा बाहर आने लगे हैं।
ये वही खनिज हैं जिनसे स्मार्टफोन, इलेक्ट्रिक कार, मिसाइल सिस्टम और फाइटर जेट्स बनते हैं। फिलहाल इन पर चीन का दबदबा है।
ट्रंप चाहते हैं कि ग्रीनलैंड को हासिल कर अमेरिका इस रेस में नई वैश्विक सुपरपावर बन जाए।
2. ‘गोल्डन डोम’ और मिसाइल डिफेंस का मास्टर प्लान
ट्रंप के प्रस्तावित Golden Dome Missile Defense System के लिए ग्रीनलैंड को सबसे रणनीतिक जगह माना जा रहा है।
नॉर्थ पोल के पास स्थित होने की वजह से यहां से रूस या चीन की मिसाइल गतिविधियों को बेहद पहले ट्रैक किया जा सकता है।
ट्रंप का साफ संदेश है—
“अगर अमेरिका यहां नहीं पहुंचा, तो रूस या चीन अपनी सैन्य चौकियां बना लेंगे।”
3. भविष्य का सबसे छोटा व्यापारिक रास्ता
बर्फ पिघलने से आर्कटिक महासागर में Northern Sea Route खुल रहा है, जो एशिया और यूरोप के बीच दूरी को हजारों मील कम कर सकता है।
ग्रीनलैंड पर नियंत्रण का मतलब है—
भविष्य के वैश्विक व्यापार की चाबी हाथ में होना
यूरोप अलर्ट मोड में, डेनमार्क का साफ इनकार
ट्रंप की इस जिद ने यूरोप को चौकन्ना कर दिया है।
फ्रांस, जर्मनी और ब्रिटेन ने डेनमार्क के समर्थन में ग्रीनलैंड के आसपास अपनी सेनाएं तैनात कर दी हैं।
वहीं डेनमार्क ने दो टूक शब्दों में कहा—
“ग्रीनलैंड बिकाऊ नहीं है।”
आगे क्या? जनता विरोध में, लेकिन सैन्य विकल्प खुले
ताजा सर्वे बताते हैं कि ग्रीनलैंड की 85% आबादी अमेरिका का हिस्सा नहीं बनना चाहती।
इसके बावजूद व्हाइट हाउस से संकेत मिले हैं कि
“सभी विकल्प खुले हैं, सैन्य विकल्प भी।”
बुधवार को हुई अमेरिका-डेनमार्क हाई-लेवल मीटिंग भी बिना नतीजे के खत्म हो गई, जिससे आने वाले दिनों में वैश्विक तनाव और बढ़ने की आशंका जताई जा रही है।
निष्कर्ष
ग्रीनलैंड अब सिर्फ बर्फ का द्वीप नहीं, बल्कि संसाधन, सुरक्षा और वैश्विक शक्ति संतुलन की जंग का केंद्र बन चुका है।
अब देखना यह है कि यह टकराव कूटनीति से सुलझेगा या दुनिया एक नए आर्कटिक संघर्ष की ओर बढ़ेगी।
