ईरान में सत्ता बदली तो भारत या चीन, किसे लगने वाला है जोर का झटका?
ईरान इन दिनों अपने इतिहास के सबसे नाज़ुक दौर से गुजर रहा है। सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई के खिलाफ भड़के देशव्यापी प्रदर्शनों ने सत्ता परिवर्तन की अटकलों को तेज कर दिया है। महंगाई, बेरोजगारी और सरकारी दमन से त्रस्त लाखों लोग सड़कों पर उतर आए हैं। हालात ऐसे बनते जा रहे हैं कि इस उथल-पुथल का असर सिर्फ ईरान तक सीमित नहीं रहेगा—भारत और चीन दोनों के लिए यह बड़ा रणनीतिक झटका साबित हो सकता है।
वहीं दूसरी ओर, अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की सख्त चेतावनियां और इजरायल की युद्ध तैयारियों ने संकट को और गहरा कर दिया है। मिडिल ईस्ट एक बार फिर विस्फोटक मोड़ पर खड़ा नजर आ रहा है।
भारत पर क्या पड़ेगा असर?
भारत के लिए ईरान सिर्फ एक देश नहीं, बल्कि रणनीतिक साझेदार है। चाबहार पोर्ट और इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर (INSTC) भारत की एशिया-यूरोप कनेक्टिविटी की रीढ़ हैं।
अगर ईरान में सत्ता बदली या अस्थिरता बढ़ी, तो:
- होर्मुज जलडमरूमध्य बंद होने का खतरा बढ़ेगा
- कच्चे तेल की कीमतें $100 प्रति बैरल के पार जा सकती हैं
- भारत की ऊर्जा सुरक्षा पर सीधा असर पड़ेगा
- चाबहार प्रोजेक्ट रुकने से अफगानिस्तान-पाकिस्तान बायपास रणनीति कमजोर पड़ जाएगी
भारत को साथ ही ईरान में मौजूद करीब 1.2 लाख भारतीय नागरिकों की सुरक्षा और संभावित निकासी की चुनौती का भी सामना करना पड़ सकता है।
चीन को क्यों हो सकता है ज्यादा नुकसान?
ईरान चीन का सबसे बड़ा ऊर्जा साझेदार है। चीन रोज़ाना करीब 10 लाख बैरल तेल ईरान से खरीदता है। इसके अलावा:
- ईरान, चीन के Belt and Road Initiative (BRI) का अहम हिस्सा है
- लगभग $500 बिलियन के चीनी निवेश दांव पर लगे हैं
- ग्वादर-चाबहार कनेक्टिविटी चीन की ‘String of Pearls’ रणनीति का अहम लिंक है
अगर अमेरिका समर्थित सरकार सत्ता में आई, तो चीन-विरोधी नीतियां अपनाई जा सकती हैं, जिससे बीजिंग को बड़ा झटका लग सकता है।
वैश्विक स्तर पर क्या बदलेगा खेल?
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर ईरान कमजोर पड़ा, तो:
- कुर्द अलगाववाद को हवा मिल सकती है
- देश के विखंडन का खतरा बढ़ेगा
- पूरा मिडिल ईस्ट और ज्यादा अस्थिर हो सकता है
भारत और चीन फिलहाल संतुलन और तटस्थता बनाए रखने की कोशिश करेंगे, लेकिन हालात तेजी से बदल रहे हैं।
नज़र बनी हुई है…
ईरान की सड़कों पर उठ रही आवाज़ें अब सिर्फ सत्ता के खिलाफ नहीं, बल्कि वैश्विक भू-राजनीति की दिशा तय करने वाली बनती जा रही हैं। आने वाले दिन तय करेंगे कि यह आंदोलन बदलाव की शुरुआत है या दुनिया को एक और बड़े संकट की ओर ले जाने वाला मोड़।
